आज सवेरे ही जब में अपनी धर्मपत्नी को लेकर डाक्टर को दिखाने के लिए निकला तो देखा की शहर की साड़ी सड़कें केसरी रंग में रंगी पड़ी थी। जिस शहर में बड़े बड़े पोस्टर्स लगे हुए हैं की रुड़की शहर में बैनर, पोस्टर इत्यादि लगाने पर पूर्णतः प्रतिबन्ध है उस शहर की शायद ही कोई ऐसी जगह बची होगी जहाँ हमारे माननिये मुख्यमंत्री जी के आने की खुशखबरी का बैनर या पोस्टर नहीं लगा हो. रास्तों पर गति अवरोधक और नाकाबंदी देख कर मालूम पड़ा की जिस रास्ते पर में जा रहा था उसी रास्ते से मुख्यमंत्री जी का काफिला निकलने वाला था। मुझे एक पुलिस वाले द्वारा निर्देश दिया गया की में अपना वहां यहाँ से हटाकर दूसरी और धर्मशाला के सामने लगा लू। में वहां वहां लगाकर क्लिनिक की तरफ बढ़ गया. देखते ही देखते वो साड़ी सड़क साफ़ करा दी गयी. वहां खड़े ठेले वाली, स्कूटी, मोटरसाइकिल , साइकिल, दुकानों के बोर्ड राह चलते वहां और लोग सब पर रोक लगा दी गयी. अब बज़्म तिराहे से लेकर नेहरू स्टेडियम तक पूरी सड़क सुनसान थी क्यूंकि वहीँ ट्रैफिक रोक लिया गया था. डॉ को दिखने के बाद जब में गाडी की और बढ़ा तो मालूम पड़ा की मेरी गाडी भी उठा ली गयी थी पुलिस वालो द्वारा. गुस्सा तो खूब आया पर धर्मपत्नी की तबियत जरा नासाज थी इसलिए में रिक्शा ढूंढने निकल पड़ा सोचा पहले रिक्शा ढूंढ लू इसे घर छोड़ दू फिर गाडी ढूंढने जाऊंगा। पर रिक्शा तो तब मिले जब सड़क पर किसी परिंदे को चलने की अनुमति हो. तो कुछ मीटर दूर चल कर वहीँ एक एटीएम की छाँव में बैठ गए और इन्तजार करने लगे VVIP महोदय के गुजरने का। पूरा आधा घंटा ट्रैफिक जाम लगा रहा और कुछ देर बाद सायं सायं करती हुई एम्बुलेंस और उसके पीछे VVIP काफिला आया. उनके जाने के बाद भीड़ अपनी अपनी जगह से ऐसी भागी जैसे बरसात में बांध में पानी ओवरफ्लो हो गया हो तो किसी बांध के कपाट खुल गए हों.
इस दौरान में कुछ लोगो की बात सुन रहा था क्यूंकि में भी परेशान तो में भी इंतजार कर रहा था , दो लोग आपस में बात कर रहे थे.
१. कौन आ रहा है ?
२. मुख्यमंत्री ?
१. कौनसा ?
२. अपने वाला
उनकी बातों में काफी अपना पन था। तभी मुझे अंदर जाना पड़ा वापस आया तो दोनों बात कर रहे थे
ये लोग ५ साल में सिर्फ एक बार दीखते हैं , बाकी वक़्त सिर्फ जनता को परेशां करने के लिए रहते हैं.
ऐसा क्यों है?
क्यों हमारे ही द्वारा बनाया गया मंत्री हमारे ही सर पे चढ़ के बैठ। कौन है वो लोग जो इनकी रैलियों में गाड़ियां , ट्रेक्टर ट्राली भर \भर के पहुंच जाते हैं. सर पे बड़े बड़े बैनर लिए. बुधि ७० - ७० साल की औरतें. बच्चे। . ये सब कौन है. में इन् सब चीजों को करीब से जानता हूँ क्यूंकि में इवेंट की ही फील्ड में हु. २०० और ५०० रस के लालच में इन्हे गाड़ियां भर भर के लाया। ताकि काफी भीड़ दिखाई दे. कुछ नहीं बदल रहा है. सिर्फ सरकारों के अलावा. और कोई रास्ता है भी नहीं. ये vvip कल्चर बंद होना चाहिए। वो दो लोग जो क्लिनिक के बहार खड़े थे वो एक बीमार के साथ आये थे जिसको डेंगू हुआ था , और उसकी हालत काफी ख़राब थी। शरीर पे निशान और पूरा शरीर पसीने से तर बतर था। गाडी भी पास नहीं ला सकते थे. असल में वो सड़क ही पूरी हॉस्पिटल से भरी हुई है. वैसे तो बोलते हैं की एम्बुलेंस को रास्ता दे पर एम्बुलेंस भी रोकी हुई थी. क्या इसी दिन के लिए हम सरकारें चुनते हैं। उधर जब में अपनी गाडी छुड़ाने गया तो मुझपर ही १३०० का चालान ठोकने लगे. में तो अपनी जिद पे अड़ गया की मुझे लिख कर दो की पुलिस की बात नहीं सुन नई है। में चालान भर दूंगा. भला को इंस्पेक्टर का जिन्होंने बात को समझी. पर वहीँ खड़े मेरे ही जैसे एक व्यक्ति जिनकी हार्ट पेशेंट बीवी पिछले १ घंटे से कड़ी थी ७० साल की उम्र से ज्यादा की उम्र होगी उनकी। वो कह रहे थे की जो पैसा लेना है ५०० - ६०० रूपी लेकर गाडी छुड़वा लेते हैं. मेने उन्हें समझाया की अगर हम खड़े नहीं होंगे अपने हक़ के लिए तो कौन होगा पर उनकी समझ नहीं आयी। आएगी भी नहीं. क्यूंकि समझने वाला युवा अपनी आँखें बंद करके बैठा है. और जिस और राजनीती की हवा बह रही है. खादी के कुर्ते और पायजामा सिलवा कर हाथ जोड़ कर खड़ा उसी पार्टी के निशान के साथ अपना बैनर लगवा रहा है। हमारा युवा जिस दिशा में जा रहा है उसे वो दिशा बदलनी ही होगी और अपने खुद के नए तरीके निकालने होंगे। वरना आज ये युवा है और कल ये वही आदमी होंगे जो ५०० रूपए देकर इस मुसीबत से पीछा छुड़ाना चाहते थे।
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